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Principal Message

संसार में प्रत्येक प्राणी मन, बुध्धि, अहंकार और ज्ञानेन्द्रियों एवम कर्मेन्द्रियो के साथ जन्म लेता है ! मनुष्य सभी प्राणियो में श्रेष्ट कहा गया है और शिक्षक सभी मनुष्यों में श्रेष्ट! इस श्रेष्टता का कारण मन, बुध्धि, अहंकार आदि न होकर एक ऐसे तत्व का पाया जाना है जो सब में नहीं होता है वह है प्रघ्या!

प्रघ्या मनुष्य को आहार निंद्रा भय मैथुन आदि से ऊपर उठा कर उचित अनुचित विवेक अविवेक सत्य असत्य आदि को जांचकर उसपर चलाना सिखाती है! 

इसलिए कहा गया है -

ज्ञानजन्या भवेदिच्छा इच्छा चेष्टा क्रतिभार्वेद!! 

क्रतिर्जन्या फल प्रज्ञा गुरुरेव हि विचारयति!!

अथार्थ जिसका जेसा ज्ञान होगा वैसी इच्छा होगी और जेसी आपकी इच्छा होगी वैसी चेष्टा होगी और जेसी चेष्टा होगी वैसी ही कृति होगी और कृति के अनुसार फल प्राप्त होगा! और इस पर सिर्फ प्रज्ञावान ही विचार कर सकते है !

शिक्षक हमेशा प्रज्ञावान होना चाहिए! जो प्रज्ञायुक्त नहीं है वह शिक्षक नहीं हो सकता है! आइये इस संसार में मानवीय जगत के शिक्षारूपी मंदिर में, जन्हा पर शिक्षा रूपी देवता के पूजा अर्चना हेतु प्रज्ञावान छात्र रूपी पुष्पों कि आव्श्यकता है जो गुरु रूपी पुजारी के नेतृत्व में अपने आपको सुवासित कर शिक्षा रूपी देवता के लिए अर्पित हो सके!

 

डॉ गुलाबधर द्विवेदी

प्राचार्य